Saturday, 1 October 2016

एक आवारा मुस्कान का असर


तेरी मुस्कराहट मेरे दिल को,
कुछ ऐसे  चीर निकली है
मेरे क़त्ल का तेरा मकसद
खुद-ब-खुद पूरा हो गया

वो शहर तेरी गलियां तेरे कूचे,
मेरी आवारगी को पुकारें हैं I
क्या जानें अपनी आवारगी का,
बड़ा अब और घेरा हो गया I

कहाँ उसकी रात ढलती है,
कहाँ कब सवेरा हो गया I
घर से निकल पड़ा उसका,
बस, सफ़र ही बसेरा हो गया I


तुझे मुबारक हो, ज़मीनें तेरी,
तेरी सल्तनतें, तेरी सरहदें I
मैं, जब भी जिसको भी मिला,
हँसते हँसते मेरा हो गया I
  

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