Sunday, 11 September 2016

तन्हा

वो तन्हा था, वो क्या करता,
जो हाल -ए-दिल भी न कहता,
तुझे दीवानगी की उसकी,
कभी पता लगता, ना लगता

अकेला था वो सफ़र में ,
शब्-ए-गम भी उसे छोड़ गया
कल बुलाने से तेरे वो,
कहीं फिर रुकता, ना रुकता

सन्नाटा भीड़ के बीच
सुन रहा जो बरसों
पुकारे के तेरे उसपर
असर जाने, दिखता न दिखता 

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-09-2016) को "खूब फूलो और फलो बेटा नितिन!" (चर्चा अंक-2464)) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपका साभार धन्यवाद

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