Sunday, 4 September 2016

ऐ ज़मीं मुझे पास बुला ले

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले .
बदले रुख हर छिन हर पल,
हरी चादर के बिछोने पर सुला ले.

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले

न आसमान हैं न जमीं मिलती,
पंख पंछी चाहे जितने फैला ले .
नज़र में सब, न कुछ पकड़ में
चला जाता है खुद को संभाले .

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले

खो गए कई परिंदे अपने थे जो
उनको भी सफ़र में संग बुला ले .
घोसलों में उनके जाने में घबराऊं
मुझे फिर से मेरे साथी छूटे दिला दे

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले



No comments:

Post a Comment