Saturday, 5 August 2017

बेकार पड़ा दिल



फूट न जाये, दर्द से,

इधर उधर भटकता है
खाता है ठोकरें ये दिल
किसी फुटबॉल की तरह

मैं दूर तुझसे भाग भाग

तेरी यादों को पिघलता हूँ,
जो जम रहीं हैं दिल में,
मेरे, कोलेस्ट्रोल की तरह

तारीफ़ तो सबने की पर,

दिल का कोई खरीदार नहीं,
ये भी बेकार पड़ा है किसी,
फाइव स्टार मॉल की तरह



Tuesday, 25 July 2017

स्वयं से वार्ता



वो ह्रदय सागर सा करे,
तो,बातों की जलमाला, 
हैं, तटबंध में कैद जो,
का कर देता , विसर्जन

स्वयं की प्रिय से की वार्ता,
विरचे मन हिमाला में
बन भागीरथ इहरोज,
हटा देता हूँ अड़चन

शब्द समस्त मिलते  हैं
नाविक के तीर की तरह,
मैं स्वयं के ह्रदय को,
कर लेता हूँ.सागर सम




Wednesday, 12 July 2017

शहर बीमार है

फिर से शहर ये है बीमार,
है क्या कोई तीमारदार,
है क्या कोई शल्य तैयार
फिर से शहर ये है बीमार,

धुंध,धुम्र, फर्क जाने कौन,
कौन यहाँ पहचाने मौन,
 वृक्ष सब में है  हाहाकार
फिर से शहर ये है बीमार

सब मुंह खुले, सब आँखें बंद,
हैं जाग रहे मनुज बस चंद,
फैला अपशिष्ट, नीर में विकार
फिर से शहर ये है बीमार,
है क्या कोई तीमारदार,
है क्या कोई शल्य तैयार

Saturday, 1 July 2017

Crush को love कहने का डर

जब भी crush को love कहा,
उसने हमें यूँ, curse कर दिया, 
हालात सुधरने की उम्मीद को,
bad से उसने worse कर दिया.

इज़हार-ए-इश्क को समझा था,
घाव-ए-जुदाई का मरहम हमने,
बस एक ही चप्पल में उसने,
इस नासूर को nurse कर दिया.

ख्व़ाब देखता था जो दिल उसके,
video viral  होने  के डर से, 
रात भर जगता है,
सच कहा है- थप्पड़ से डर नहीं ,
साहब डर चप्पल  से लगता है.

Saturday, 1 October 2016

एक आवारा मुस्कान का असर


तेरी मुस्कराहट मेरे दिल को,
कुछ ऐसे  चीर निकली है
मेरे क़त्ल का तेरा मकसद
खुद-ब-खुद पूरा हो गया

वो शहर तेरी गलियां तेरे कूचे,
मेरी आवारगी को पुकारें हैं I
क्या जानें अपनी आवारगी का,
बड़ा अब और घेरा हो गया I

कहाँ उसकी रात ढलती है,
कहाँ कब सवेरा हो गया I
घर से निकल पड़ा उसका,
बस, सफ़र ही बसेरा हो गया I


तुझे मुबारक हो, ज़मीनें तेरी,
तेरी सल्तनतें, तेरी सरहदें I
मैं, जब भी जिसको भी मिला,
हँसते हँसते मेरा हो गया I
  

Sunday, 11 September 2016

तन्हा

वो तन्हा था, वो क्या करता,
जो हाल -ए-दिल भी न कहता,
तुझे दीवानगी की उसकी,
कभी पता लगता, ना लगता

अकेला था वो सफ़र में ,
शब्-ए-गम भी उसे छोड़ गया
कल बुलाने से तेरे वो,
कहीं फिर रुकता, ना रुकता

सन्नाटा भीड़ के बीच
सुन रहा जो बरसों
पुकारे के तेरे उसपर
असर जाने, दिखता न दिखता 

Sunday, 4 September 2016

ऐ ज़मीं मुझे पास बुला ले

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले .
बदले रुख हर छिन हर पल,
हरी चादर के बिछोने पर सुला ले.

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले

न आसमान हैं न जमीं मिलती,
पंख पंछी चाहे जितने फैला ले .
नज़र में सब, न कुछ पकड़ में
चला जाता है खुद को संभाले .

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले

खो गए कई परिंदे अपने थे जो
उनको भी सफ़र में संग बुला ले .
घोसलों में उनके जाने में घबराऊं
मुझे फिर से मेरे साथी छूटे दिला दे

डर लगता है, हवाओं में अब,
ऐ ज़मीं, मुझे पास बुला ले