Saturday, 5 May 2018

ईश्वर

धीरे से आ, कानों में बोलता
वो जो अगनित प्रश्न करता है
शून्य को असंख्य से तोलता,
वो सम समस्त को करता है

ढक देता है कभी बादल से
कहीं रेत, तो कहीं बर्फ बन
जब पर्वत सा दम्भ उठता
धूलि धूसरित उसे करता है

कौन मेरी प्रार्थना सुन चुपसे
शूल राह के कुसुम कर देता
और कौन प्रकृति के प्रतिशोध
लेने को नृत्य तांडव करता है

वो जो हँसता है, रोता है, जब,
जब उसे पूजने वाले, लड़ते
पूजन की विधियों को लेकर,
सारे पुण्य तब पाप करता है





Monday, 30 April 2018

क्यों बन जाऊं मैं बुद्ध

हो जाता मैं बुद्ध
पर मुझे ज्ञान है
उस सत्य का जिसे
खोज नहीं पाए बुद्ध।
जब एक घर का पिता
चला जाता है तो, घर
कैसे बीमार हो जाता है
कैसे कमर झुक जाती है
यौवन में ही पुत्र की।
जब अपने कर्तव्यों को
छोड़ अपूर्ण पलायन करे
कितने स्वप्न मृत होते है।
सत्य धरती के जान के
कैसे मैं बन जाऊं बुद्ध
क्यों ढूंढ लाऊँ परासत्य
क्यों बन जाऊं मैं बुद्ध।

Saturday, 28 April 2018

कौन हो तुम

क्या ख्वाब मेरे तुझे भी
परेशान किया करते हैं
जैसे की सपने तेरे, मुझे
दिन में भी दिखा करते हैं।

तू चाँद तो नहीं है, और 
तू तबस्सुम भी तो नहीं
हुस्न न मुरझा बरसों से,
इसपे अमावस भी नहीं।

तू आफताब हो सकती थी,
चमक से तेरी लोग जलते हैं
पर याद में तेरी जो ठंडक है
हिमाला की चोटी में भी नहीं

कुदरत का हर हुनर है तुझमें
जुदा से लगते है जलवे तेरे
खुद तू ही बता अपने बारे में
कही तू खुद  ही ख़ुदा तो नहीं




Thursday, 26 April 2018

चुनाव और दोस्त

बदले बदले से वो हालात नज़र आते है
चुनाव आते हैं, दोस्त कहाँ चले जाते हैं
सबके चश्मों पर चढ़ा रंग बड़ा गहरा है
सबको जुदा जुदा, हालात नज़र आते हैं

किसी को समस्या में, केसरिया दिखता है
कोई इतिहास में इसकी जड़ ढूंढ लाते हैं
कोई दूर की कौड़ी, किस्से कथा लाता है
कोई अपना इतिहास अलग गढ़े जाते हैं

मेरे ये सारे यार दोस्त कही खो जाते हैं
कई तो दुश्मन हो जाते है चिल्लाते हैं
क्यों चुनाव आते हैं, दोस्त खो जाते हैं
कोई और हो जाते है, कहीं चले जाते हैं




Thursday, 29 March 2018

जीवन मृत्यु चक्र

जीवन जब तक है, तब तक है
स्वास, आस, नींद, भूख प्यास।
विदा होगी ये काया नश्वर , रहेंगे
पात्र मात्र बन, किस्सा, इतिहास।
विचारों में कदा चिंतन करते रहते
मिल जाते, मिल पाते हम काश।
पाश्ताचप, अंतर्द्वन्द, अंतर्व्यथा
होता अपना कोई जो निश्वास।
इस पार न मिले कोई कभी तो
कर्म कर, किंचित न हो उदास
ईश्वर की तार से गुँथे हम सब
मिलेंगे उस पार,  रख बिश्वास

Wednesday, 14 March 2018

विरह व मिलन

ये मेरे मन की जो तारें हैं
कई तारों को छू आती हैं
या तो जब तुम आते हो
या याद तुम्हारी आती है

विचारों में विचरण करते
विह्वलता मन में आती है
जब साथ तुम्हे न पाता हूँ
और याद तुम्हारी आती है

शांत उर गति हो जाती है
अचंभित सा रह जाता हूँ
जब याद तुम्हारी आती है
और दर्श तुम्हारे पाता हूँ






Thursday, 8 February 2018

मैं भी प्रकृति हूँ

कहीं से पानी सा बहता,
चला जा रहा हूँ,
मुसाफिर हूँ या हूँ में नदिया,
ठहर जाता हूँ सफर में,
मुझमे समा जाते है सारे मंजर,
साहिल हूँ या हूँ मैं दरया,
कहीं पे मेरी है ज़रुरत,
और कही हूँ गैरज़रूरी
कभी सफर की हूँ मैं मंज़िल,
तो कहीं राह अधूरी,
ये पेड़ों के गिरते पत्ते,
कल उन्ही पर फिर उगेंगे
बनके छोटी सी नन्ही कपोलें,
कर चक्र पूरा इक जनम का,
हवा के झोंके, न इनसे जलना,
नहीं है कुछ भी इनके बस में,
बदलते रहते हैं , अपनी सीरत,
ये हर वक़्त बदलते मौस्मों से,
बादलों का भी रूप देखा,
कभी गरजते , कभी बरसते,
कभी तैरते कपास बन कर,
मैं भी तो हूँ बस इन्ही सरीखा
कभी धूप हूँ , कभी हूँ छाया,
कभी त्याग हूँ , कभी हूँ माया,
कभी हूँ अपना, कभी पराया,
जो धारक है, उसकी आकृति हूँ
बदलता हूँ, मैं भी प्रकृति हूँ