Thursday, 8 February 2018

मैं भी प्रकृति हूँ

कहीं से पानी सा बहता,
चला जा रहा हूँ,
मुसाफिर हूँ या हूँ में नदिया,
ठहर जाता हूँ सफर में,
मुझमे समा जाते है सारे मंजर,
साहिल हूँ या हूँ मैं दरया,
कहीं पे मेरी है ज़रुरत,
और कही हूँ गैरज़रूरी
कभी सफर की हूँ मैं मंज़िल,
तो कहीं राह अधूरी,
ये पेड़ों के गिरते पत्ते,
कल उन्ही पर फिर उगेंगे
बनके छोटी सी नन्ही कपोलें,
कर चक्र पूरा इक जनम का,
हवा के झोंके, न इनसे जलना,
नहीं है कुछ भी इनके बस में,
बदलते रहते हैं , अपनी सीरत,
ये हर वक़्त बदलते मौस्मों से,
बादलों का भी रूप देखा,
कभी गरजते , कभी बरसते,
कभी तैरते कपास बन कर,
मैं भी तो हूँ बस इन्ही सरीखा
कभी धूप हूँ , कभी हूँ छाया,
कभी त्याग हूँ , कभी हूँ माया,
कभी हूँ अपना, कभी पराया,
जो धारक है, उसकी आकृति हूँ
बदलता हूँ, मैं भी प्रकृति हूँ

Tuesday, 30 January 2018

समझो तुम जिन्दा हो

जब बादल में से झांकती धुप बुलाये
जब सर्दी की शाम की घाम बुलाये
जब बुलाये जून की भोर की किरण
जब बसन्त की दुपहरी सरेआम बुलाये

जब रंगीले फूलों के रंग बाग़ में बुलाये
जब जंगल भेदती वायु सनसन बुलाये
जब बुलाये नदिया तट रेत की चांदी
जब समंदर तट पर लहरें नटखट बुलाये


जब कभी गगन पर मेघ कपासी बुलाये
जब मेघो में गुम सी पर्वतमाला बुलाये
जब बुलाये हरे पत्तों पर बर्फ सफ़ेद
जब धनुष गगन में  रंगों वाला बुलाये

समझ लो जीवित हो तुम अब भी मन में
है उमंग अभी भी बाकी तुम्हारे जीवन  में
कहीं तुम्हारे अंदर भोला बालक जीता है
रहता है स्वर्ग भीतर ही तुम्हारे ही मन में

Friday, 24 November 2017

पहुँच मेरी आत्मा की

नहीं मात्र इस शरीर में
हूँ जहाँ तक है ये नजर
तेरा मेरी आँखों में और
मेरा तेरी आँखों में बसर

आदमी सोच सा हो जाता है
पर ऐसा अवसर न हुआ
बहुत सोचा तेरे बारे में पर
मैं अब तक ईश्वर न हुआ

मेरे पास ईशवर था के नहीँ
तेरी याद तो हमेशा ही रही
कोई मलाल नही दुख़ नहीँ
के
ना खुदा ही मिला न विसाले सनम

Sunday, 17 September 2017

सफर और जिन्दगी

जि़न्दगी और सफर,
कभी कार, कभी बेकार
कभी बस, तो कभी बेबस
कभी रेल, कभी रेलमपेल
कभी हवा हवाई, कभी चेहरे पर
जिन्दगी का सफर

Saturday, 9 September 2017

पच्चीस बरस बाद दोस्तों से पुनर्मिलन पर

Meeting that took place at sultanpur UP classmates from all over world came to attend reunion
मिट्टी में कुछ तो बात होती है
वरना कहाँ सारी दुनिया की
इस तरा मुलाकात होती है

उड़ गये थे जो परिंदे
लौट आए हैं, बरबस
सच है राह परिंदों को
घर की याद होती है

बरस सिमट कर
खो जाते हैं, जाने कहाँ
जब भी मेरी इन दोस्तों से
कहीं भी कोई बात होती है

Saturday, 5 August 2017

बेकार पड़ा दिल



फूट न जाये, दर्द से,

इधर उधर भटकता है
खाता है ठोकरें ये दिल
किसी फुटबॉल की तरह

मैं दूर तुझसे भाग भाग

तेरी यादों को पिघलता हूँ,
जो जम रहीं हैं दिल में,
मेरे, कोलेस्ट्रोल की तरह

तारीफ़ तो सबने की पर,

दिल का कोई खरीदार नहीं,
ये भी बेकार पड़ा है किसी,
फाइव स्टार मॉल की तरह



Tuesday, 25 July 2017

स्वयं से वार्ता



वो ह्रदय सागर सा करे,
तो,बातों की जलमाला, 
हैं, तटबंध में कैद जो,
का कर देता , विसर्जन

स्वयं की प्रिय से की वार्ता,
विरचे मन हिमाला में
बन भागीरथ इहरोज,
हटा देता हूँ अड़चन

शब्द समस्त मिलते  हैं
नाविक के तीर की तरह,
मैं स्वयं के ह्रदय को,
कर लेता हूँ.सागर सम